*जिस हाथ में थी घर की जिम्मेदारी, उसी हाथ ने थामी खेती की कमान, हेमलता ने लिखी आत्मनिर्भरता की नई कहानी, बिहान’ से मिला समूह का सहारा, 60 हजार रुपए के ऋण से शुरू की फसल और सब्जी की खेती, अब करीब 2 लाख रुपए सालाना आमदनी*

By
Kishor Manhar
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सारंगढ़–बिलाईगढ़, 26 सितंबर 2026। सुबह की पहली किरण के साथ खेत की ओर बढ़ते कदम, फसलों की देखभाल में बीतता समय और अपनी मेहनत से उगाई उपज को बाजार तक पहुंचाकर होने वाली आमदनी—ग्राम डोमाडीह (अ) की श्रीमती हेमलता पटेल के जीवन में आज यही बदलाव की पहचान बन चुका है। कभी घर-परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित उनकी दिनचर्या अब आत्मनिर्भरता की नई राह पर आगे बढ़ रही है। खेती उनके लिए अब केवल फसल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक मजबूती और बच्चों के बेहतर भविष्य का आधार बन गई है।

हेमलता की हमेशा से इच्छा थी कि वे परिवार की आमदनी में सहयोग करें और अपने पैरों पर खड़ी हों। लेकिन संसाधनों की कमी के कारण उनके सामने कई चुनौतियां थीं। इसी दौरान राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ के अंतर्गत वे खुशी स्व सहायता समूह से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें नियमित बचत, ऋण सुविधा और विभिन्न आजीविका गतिविधियों के बारे में जानकारी मिली। समूह और क्लस्टर के सहयोग से उन्हें उद्यम के लिए 60 हजार रुपए का ऋण प्राप्त हुआ।

हेमलता ने इस अवसर को अपनी मेहनत का माध्यम बनाया। उन्होंने ऋण की राशि का उपयोग फसल उत्पादन और सब्जी की खेती को बढ़ाने में किया। खेती के बेहतर प्रबंधन, नियमित देखभाल और मेहनत के साथ उन्होंने उत्पादन बढ़ाया। खेत में तैयार फसल और ताजी सब्जियों को स्थानीय बाजार तक पहुंचाकर उन्होंने अपनी उपज का बेहतर लाभ लेना शुरू किया।

धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी। अच्छे उत्पादन और बिक्री के दिनों में उनकी आमदनी करीब 3 से 4 हजार रुपए प्रतिदिन तक पहुंचने लगी। वर्तमान में खेती और सब्जी उत्पादन से उनकी वार्षिक आय लगभग 2 लाख रुपए हो गई है।

इस बदलाव का असर केवल खेत और बाजार तक सीमित नहीं है। हेमलता अब परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। बच्चों की पढ़ाई, घर की आवश्यकताओं और भविष्य की योजनाओं में उनका योगदान बढ़ा है। आर्थिक मजबूती के साथ उनके आत्मविश्वास में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

हेमलता के लिए खुशी स्व सहायता समूह महज एक समूह नहीं, बल्कि उनके जीवन में बदलाव की महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ। ‘बिहान’ के माध्यम से मिला समूह का सहयोग और क्लस्टर से प्राप्त ऋण ने उनकी मेहनत और क्षमता को आजीविका के अवसर में बदलने का रास्ता दिया। खेती से होने वाली आमदनी ने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के साथ यह विश्वास भी दिया कि यदि ग्रामीण महिलाओं को अवसर, मार्गदर्शन और सहयोग मिले तो वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के साथ अपनी अलग पहचान भी बना सकती हैं।

आज हेमलता पटेल की कहानी खेत की मिट्टी से निकलकर आत्मनिर्भरता की कहानी बन चुकी है। उनकी यह यात्रा बताती है कि अवसर भले छोटा हो, लेकिन उसके साथ मेहनत, समूह का सहयोग और आगे बढ़ने का विश्वास जुड़ जाए तो वही अवसर जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है।

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